ट्रांसफॉर्मर जलने के बाद घंटों नहीं आती बत्ती, क्या करता है बिजली विभाग?

गर्मियों के मौसम में बिजली की मांग बढ़ते ही ट्रांसफॉर्मर फुंकने या जलने की खबरें आम हो जाती हैं। ट्रांसफॉर्मर जलते ही पूरे इलाके की बत्ती गुल हो जाती है और जनता परेशान होने लगती है। ऐसे में अक्सर उपभोक्ताओं के मन में यह सवाल उठता है कि ट्रांसफॉर्मर जलने के बाद बिजली विभाग आखिर क्या करता है और नया ट्रांसफॉर्मर आने में इतना समय क्यों लगता है? आइए जानते हैं ट्रांसफॉर्मर जलने के बाद बिजली विभाग की कार्यप्रणाली

1: शिकायत दर्ज होना और ‘सप्लाई ऑफ’ करना

जैसे ही किसी ट्रांसफॉर्मर में आग लगती है या वह ओवरलोडिंग के कारण फुंकता है, तो सबसे पहले सब-स्टेशन (पावर हाउस) से उस फीडर की सप्लाई को तुरंत बंद किया जाता है ताकि बड़ा हादसा न हो। इसके बाद उपभोक्ता या लाइनमैन के जरिए संबंधित जूनियर इंजीनियर (JE) या उपखंड अधिकारी (SDO) तक सूचना पहुँचती है।

2: मौके पर जांच और ‘डैमेज रिपोर्ट’ (DR) तैयार करना

सूचना मिलते ही बिजली विभाग की तकनीकी टीम (लाइनमैन और फोरमैन) मौके पर पहुँचती है। सबसे पहले यह चेक किया जाता है कि खराबी मामूली है (जैसे केबल जलना या फ्यूज उड़ना)। यदि ट्रांसफॉर्मर पूरी तरह जल गया है, तो JE द्वारा एक डैमेज रिपोर्ट (DR) तैयार की जाती है। इस रिपोर्ट में ट्रांसफॉर्मर की क्षमता (जैसे 25, 63, 100 या 250 KVA) और जलने का कारण दर्ज किया जाता है।

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3: स्टोर से नए ट्रांसफॉर्मर की डिमांड और मंजूरी

डैमेज रिपोर्ट तैयार होने के बाद इसे ऑनलाइन या ऑफलाइन सिस्टम के जरिए मुख्य स्टोर भेजा जाता है। विभागीय नियमों के अनुसार, जले हुए ट्रांसफॉर्मर को बदलने के लिए उच्च अधिकारियों से वित्तीय और प्रशासनिक मंजूरी लेनी होती है। इसके बाद पुराने (जले हुए) ट्रांसफॉर्मर को उतारकर स्टोर वापस भेजने और नया ट्रांसफॉर्मर जारी कराने की प्रक्रिया शुरू होती है।

4: परिवहन और रिप्लेसमेंट (बदलने की प्रक्रिया)

नया ट्रांसफॉर्मर स्टोर से क्रेन या हाइड्रा गाड़ी के जरिए प्रभावित इलाके में लाया जाता है। पोल (खंभों) पर चढ़े भारी-भरकम ट्रांसफॉर्मर को उतारना और नए को सुरक्षित रखना बेहद जोखिम भरा काम होता है। इस दौरान लाइनमैन क्रेन की मदद से नए ट्रांसफॉर्मर को फिट करते हैं।

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5: टेस्टिंग और लोड री-बैलेंसिंग

नया ट्रांसफॉर्मर लगाने के तुरंत बाद बिजली चालू नहीं की जाती। टीम पहले उसमें ऑयल लेवल चेक करती है। इसके बाद ‘अर्थिंग’ और फ्यूज (HG Fuse) को दुरुस्त किया जाता है। सब-स्टेशन से धीरे-धीरे लोड छोड़ा जाता है और यह सुनिश्चित किया जाता है कि फेज बैलेंस्ड रहें ताकि नया ट्रांसफॉर्मर दोबारा न फुंके।

कितने समय में बदलना जरूरी है?

विद्युत नियामक आयोग के नियमों के मुताबिक शहरी क्षेत्रों में ट्रांसफॉर्मर जलने के 12 से 24 घंटे के भीतर उसे बदलना अनिवार्य है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में इसके लिए 48 से 72 घंटे का समय तय किया गया है।

देरी का कारण

अक्सर नया ट्रांसफॉर्मर आने में 2 से 3 दिन लग जाते हैं, जिसके पीछे मुख्य कारण विभागीय स्टोर में बैकअप स्टॉक की कमी होना, सरकारी कागजी कार्रवाई में वक्त लगना या तंग गलियों के कारण क्रेन का मौके पर न पहुँच पाना होता है।

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